बी एड - एम एड >> बी.एड. सेमेस्टर-1 प्रश्नपत्र- IV-C - लिंग, विद्यालय एवं समाज बी.एड. सेमेस्टर-1 प्रश्नपत्र- IV-C - लिंग, विद्यालय एवं समाजसरल प्रश्नोत्तर समूह
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बी.एड. सेमेस्टर-1 प्रश्नपत्र- IV-C - लिंग, विद्यालय एवं समाज
अध्याय 1 - जेंडर की अवधारणा
[Concept of Gender]
प्रश्न- जेंडर (शब्द) से आप क्या समझते हैं?
लघु उत्तरीय प्रश्न
- लिंग (जेंडर) किस प्रकार की रचना है?
- जेंडर का सामान्य अर्थ लिखिए।
- टिप्पणी लिखिए-
(i) समाज में भूमिका
(ii) ट्रांसजेंडर
उत्तर—
विभिन्न उदाहरणों एवं वैज्ञानिक अध्ययन द्वारा जेंडर के संकल्पना को समझना सरल होता है। यह जेंडर को सामाजिक रचना की व्याख्या करने पर केंद्रित है। जेंडर की संकल्पनाओं में सम्मिलित हैं— जेंडर और लिंग में अंतर, जेंडर गतिशीलता, जेंडर अवसरकता, जेंडर विभेदीकरण तथा समानता के बीच बहस की धारणाएं। ये सारी संकल्पनाएं एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं और वर्ग, जाति, समुदाय, शिक्षा, अधिगम, राजनीतिकता आदि समस्त समाज की अन्य संरचनाओं को प्रतिबिंबित करती हैं। जेंडर के मूल समाज और संस्कृति में निहित है।
जेंडर कोई जीव-विज्ञानिक श्रेणी नहीं है, बल्कि समाज में व्यक्तियों के कार्य-व्यवहार से उत्पन्न होता है। इसलिए जेंडर को एक सामाजिक रचना के रूप में समझा जाता है, जबकि लिंग की श्रेणी इसके विपरीत है। लिंग एक जीव-विज्ञानिक रचना है। व्यक्तियों में उनके जीव-विज्ञानिक अभिलक्षण के आधार पर पुरुष और महिला में बांटा गया है। उदाहरण के लिए, महिलाएं संतान जन्म सकती हैं, जबकि पुरुष नहीं।
हिलेरी एम. लिप्स (2014) का तर्क है कि जैविक लिंग और जेंडर आपस में गुंथे होते हैं। उदाहरण के लिए, कुछ मामलों में स्त्रियों की जैविक स्थिति जीव-विज्ञानिक रचना के कारण रचित होती है। दूसरे शब्दों में, एक स्त्री गर्भ धारण करके बच्चे को जन्म देती है। यह एक पुरुषात्मकूलक कार्य है जो महिला के शरीर की जीव-विज्ञानिक धारण से सम्बन्ध है। इसलिए लिंग और जेंडर को अलग करना हमेशा सम्भव नहीं है। अपनी प्रकृति में जेंडर बहुआयामी होता है। इसका एक आयाम लिंग-पहचान या अस्तित्व है, जिसका तार्किक व्यक्ति रूप में किसी की पहचान पुरुष या स्त्री के रूप में होने से है। एक अन्य आयाम जेंडर-भूमिका का है। इसका अर्थ यह है कि महिलाएँ और पुरुष उस खास तरीके से अपना या प्रदर्शन करते हैं, जो सामाजिक या सांस्कृतिक रूप से उपयुक्त हो। तीसरा आयाम लैंगिक अभिमुखता से जुड़ा होता है— यानी क्या वे अपने ही जेंडर के प्रति आकर्षित होते हैं और/अथवा दूसरे जेंडर के प्रति भी आकर्षित होते हैं।
जेंडर एक विकासशील संकल्पना है और इसका प्रयोग समाज में महिलाओं और पुरुषों की अलग-अलग भूमिकाओं के निर्धारण के लिए किया जाता है। जेंडर पर दृष्टिपात करना का अर्थ महिलाओं और पुरुषों को अलग-अलग बाँट देना नहीं है। इसका उद्देश्य करना नहीं है। यह किसी व्यक्ति का ध्यान उन मुद्दों की तरफ आकर्षित करना है जिनके कारण महिलाओं और पुरुषों के बीच असमान समझ उत्पन्न हुए हैं। इसके साथ ही यह ऐसे उपयुक्त उपायों के साथ इन मुद्दों को प्रभावित करने को अनुमत देता है, जिससे असमानता को स्थिरस्थायी बनाने के बजाय असमानता को कम करने में सहायता मिलती है। जेंडर और जेंडर भूमिकाओं की संकल्पना यह समझने में हमारी मदद करती है कि जेंडर भूमिकाएँ व्यक्तिगत, समुदायों और उनके व्यवहारों के बीच अन्तर्क्रिया से उत्पन्न होती हैं। यह संकल्पना हमें सुझाव देती है कि पुरुषसुलभ और महिलासुलभ भूमिकाएँ जीव-विज्ञानिक विशेषणों वाले पुरुष और महिला से सम्बन्ध नहीं होतीं बल्कि ये समाजीकरण की प्रक्रिया के दौरान सीखी जाती हैं।
प्रत्येक समाज एक पुरुष या स्त्री को धीरे-धीरे एक आदमी या एक महिला में परिवर्तित कर देता है, जिसमें विभिन्न गुण व्यवहार, प्रारूप, भूमिकाएँ, उत्तरदायित्व, अधिकार और महिलाओं तथा पुरुषों की लिंग सम्बन्धी पहचान मनोवैज्ञानिक तथा सामाजिक रूप से, या यह कहिए कि ऐतिहासिक तथा सांस्कृतिक रूप से निर्धारित होती है। यह बात हमें एक महत्वपूर्ण समझ देती है कि ज्ञात है कि लिंग के विभिन्न स्तर समाजिक रूप से होते हैं। लिंग (जेंडर) शब्द बौन (सेक्स) शब्द के भिन्न अर्थ लिए हुए हैं, यह अर्थ का अन्तर 1920 में ऐन ओकले (Ann Oakley) ने महिलाओं द्वारा घरेलू कार्य पर अपनी रचनाओं के माध्यम से प्रस्तुत किया। ‘बौन’ का सम्बन्ध स्त्री और पुरुष से पाए जाने वाले जैविक, शारीरिक रचना सम्बन्धी तथा जननक्रिया अन्तरों से है। इसके विपरीत लिंग शब्द का सम्बन्ध महिलाओं और पुरुषों की सामाजिक तथा सांस्कृतिक भूमिकाओं से है।
लिंग (जेंडर) का प्रयोग एक संरचनात्मक (वैचारिक) श्रेणी या वर्ग के रूप में होता है। इसका सम्बन्ध किसी पुरुष या महिला के लिए अन्य-संबन्धित विचारों के समुच्चय से है। हमारे उपयोग बाजार स्थल की क्रियाशीलता की भाँति, समाज, पुरुष और महिलाओं में भिन्नता करता है और उनके लिए अलग-अलग सामाजिक भूमिकाएँ निर्धारित करता है। यह समाज में वे भूमिकाएँ भिन्न-भिन्न होती हैं। पुरुष जहाँ निर्माण तथा उत्पादन की भूमिकाएँ ग्रहण करते हैं, महिलाएँ पोषण एवं पालन कार्य करती हैं। उदाहरण के लिए, परिवार के भीतर पुरुष रोजी-रोटी कमाने वाले होते हैं और महिलाएँ संरक्षण, पालन और पोषण कार्य में अपनी भूमिका निभाती हैं। समाज के सम्बन्ध आक्रामकता एवं प्रभावशाली भूमिकाओं के निर्वहन से जुड़े हैं, जैसे किसी राज्य का मुखिया या सेना का। इसके विपरीत महिलाओं के लिए ये भूमिकाएँ निश्चित है जिसमें बच्चों की देखभाल या बीमारों की सेवा आदि सम्मिलित हो। कुछ विचारकों तथा शोधकर्ताओं का तर्क रहा है कि समाज में पुरुषों तथा महिलाओं के लिये भिन्न भूमिकाएँ तथा प्रत्याशाएँ निश्चित किये गये हैं क्योंकि वे जैविक रूप से अलग-अलग हैं तथा अतः यह खामियाबी एक अनिवार्यतावाद में एक रूप जब वे खामियाब कर लेते हैं कि समाज में पालन-पोषण और देखभाल करने सम्बन्धी भूमिकाओं को मात्र महिलाओं समाजगत कर सकते हैं तो हम महिला द्वारा की जा सकने वाली भूमिकाओं को सीमित कर देते हैं।
सिमोन डी बिवोआर (Simone De Beauvoir) ने अपनी पुस्तक ‘दि सेकंड सेक्स’ में यह तर्क दिया है कि “स्त्री जन्म से नहीं होती वह बाद में गढ़ी जाती है” वह माँ के रूप में जन्म नहीं लेती है। उसे माँ बनाया जाता है। ऐसा नहीं है कि महिलाएँ जन्म से ही बच्चों की देखभाल और घरों के लिये बनी हैं, अपितु महिलाओं का पालन-पोषण या पढ़ाई-लिखाई के कारण पीछे कर दिया गया, या सामाजिक तथा सांस्कृतिक अपेक्षाओं के कारण या उनके लिये उपलब्ध सीमित शैक्षिक अवसर, रोजगार सम्बन्धी अवसरों के कारण वे पीछे रह गयीं।
ट्रांस-जेंडर एक अत्यन्त व्यापक शब्द है। यह ऐसे लोगों का सूचक है जो अपने जीव-विज्ञानिक लिंग से सम्बन्ध सांस्कृतिक रूप से परिभाषित पारम्परिक लिंग भूमिकाओं के अनुरूप खरे नहीं उतरते (लिप्सेट, 2015:36)। ऐतिहासिक रूप से ट्रांस-सेक्सुअल शब्द का प्रयोग मनोचिकित्सकों द्वारा एक ऐसे समुदाय के लिये किया गया जो यह अनुभूति करता है कि उनका जीव-विज्ञानिक शरीर उनके स्वयं के अहसास से प्राप्त जेंडर पहचान से मेल नहीं खाता। ट्रांस-सेक्सुअल लोग आनुवांशिक रूप से पुरुष या महिला होते हैं लेकिन इसका विषय होता है कि वे दूसरे लिंग (सेक्स) के लोग हैं। वे एक गलत शरीर में खुद को फंसा हुआ पाते हैं और इसलिए सम्बन्ध है कि उन्हें अपनी जेंडर-पहचान के अनुसार बनाने के लिये लिंग पुनःसंगठन चिकित्सा (SRS: Sex Reassignment Surgery) से गुजरना पड़ता है।
ट्रांस-जेंडर एक अधिक समावेशी शब्द है। यह उन लोगों का वर्णन करता है जो अपनी जेंडर-पहचान को अभिव्यक्त या वर्णित करने का एक विशेष तरीका रखते हैं। “ट्रांस-जेंडर” शब्द की संकल्पना एक बहुत व्यापक शब्द के रूप में प्रयुक्त की जाती है। यह शब्द ऐसे व्यक्तियों के लिये प्रयुक्त किया जाता है, जिनकी जेंडर-पहचान या जेंडर-अभिव्यक्ति पुरुष या स्त्री की पारम्परिक अपेक्षाओं के अनुरूप खड़ी नहीं उतरती (सेबोल्टी 2011: 45)। इसलिए ट्रांस-जेंडर शब्द ट्रांस-सेक्सुअल पहचान के शारीरिक/मनोवैज्ञानिक पहलू शामिल होते हैं, और इसमें विभिन्न लैगिक अभिव्यक्तियाँ का समावेश होता है। जैसे कि सुजैन स्ट्राइकर का कहना है कि "ट्रांस-जेंडर का मतलब ऐसी सामाजिक या व्यवहारिक वह व्यवस्थाएँ जो सामाजिक रूप से निर्मित सेक्स/जेंडर सीमाओं से परे होती हैं, इन सीमाओं को प्रतिबिम्बित करती हैं या इन सीमाओं के बीच किसी विशिष्ट या अनोखे रूप में होती हैं।" (सेबोल्टी 2011:45) ट्रांस-जेंडर लोग विभिन्न संस्कृतियों में विशेष सामाजिक संस्कृतियों और प्रकारों को निर्धारित करते हैं। भारत में समुदाय कुछ विशिष्ट सांस्कृतिक भूमिकाओं को निर्धारित करता है और यह लोग स्वयं को पुरुष, महिला या इन दोनों से परे देखते हैं। हालाँकि भारतीय संस्कृति में ट्रांस-जेंडर जेंडर भूमिकाएँ सुपरिकल्पित और इससे ट्रांस-जेंडर को, संस्कृतियों को निर्धारित करने वाले लोगों को वे वैधता भी हासिल होती है, फिर भी भारत में ट्रांस-जेंडर उन समुदायों में शामिल हैं जो अत्यधिक हाशियाकृत है। ट्रांस-जेंडर को अक्सर प्रताड़ित किया जाता है, उनका उपहास उड़ाया जाता है तथा शिक्षा या रोजगार तक उनकी पहुँच नहीं होती है। भारत में नीतिगत हस्तक्षेप के कारण ट्रांस-जेंडर समुदाय के प्रति लोगों का नजरिया धीरे-धीरे बदल रहा है और शिक्षा या अन्य कहे जाने वाले कामों तक उनकी पहुँच के सम्बन्ध में कुछ बदलाव भी दिख रहे हैं।